भाजपा के दबाव में नीतीश कुमार ने पद छोड़ा
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बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का मुख्यमंत्री पद छोड़कर राज्यसभा में जाने की घटना ने जदयू कार्यकर्ताओं को हिला कर रख दिया है। कल जदयू कार्यालय, पटना में काफी हंगामा हुआ था। ललन सिंह और संजय झा के खिलाफ नारे लगाए जा रहे थे और अपशब्द भी कहे गए। शायद ये कार्यकर्ता भाजपा की राजनीति को अब समझ पाए हैं।
पूरा देश जानता है कि जिसके साथ भाजपा गई, अंततः उसी को निगल कर अपने राजनीतिक प्रभाव को बढ़ा लिया। अब एक स्वतंत्र पार्टी के रूप में जदयू का अस्तित्व कब तक बना रहेगा, ये डरावना प्रश्न जदयू कार्यकर्ताओं एवं समर्थकों के सामने मुँह बाए खड़ा है।
बिहार की यह राजनीतिक घटना पूर्व नियोजित थी, इसमें क्या कोई संदेह है? बिहार में भाजपा ने पहले से जो राजनीतिक जाल बिछाया था, आज नीतीश कुमार उसी के शिकार हो गए। एनडीए ने पिछले चुनाव में नीतीश कुमार के चेहरे पर ही चुनाव लड़ा था, लेकिन आज उन्हीं को अपने दबाव में लेकर पद से हटने की स्थिति में पहुँचा दिया गया।
यह भाजपा की कोई नई राजनीतिक चाल या चरित्र नहीं है। महाराष्ट्र सहित अन्य राज्यों में भी उनका ऐसा ही प्रदर्शन देखा गया है।
दूसरी ओर, अपने आप को समाजवादी कहने और डॉ. भीमराव अम्बेडकर का अनुयायी बताने वाले नीतीश कुमार ने सत्ता की कमान एक ऐसी पार्टी के हाथों में सौंप दी, जो बिहार समेत पूरे भारत में संविधान और लोकतंत्र को कमजोर करने, देश में मनुवादी व्यवस्था थोपने, महिलाओं के लिए असुरक्षित वातावरण पैदा करने और अल्पसंख्यकों के धार्मिक अधिकारों को सीमित करने की दिशा में काम कर रही है।
इस कृत्य के लिए इतिहास हमेशा नीतीश कुमार को कठघरे में खड़ा करेगा।
नवंबर में सरकार बनने के बाद से ही भाजपा का जो रवैया सामने आया है, उससे स्पष्ट है कि बिहार की सामाजिक समरसता और भाईचारे के सामने खतरे की आशंका पैदा हो गई है।
अतः आज तमाम प्रगतिशील, धर्मनिरपेक्ष और लोकतंत्र के हिमायती लोगों को एकजुट होकर भविष्य की चुनौतियों का सामना करना होगा।